Nigahein-Nazar-Aankhein-Shayari

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Nigahein ! Nazar ! Aankhein Shayari

Phir Na Keeje Meri Gustakh Nigahon Se Gila,
Dekhiye Aapne Phir Pyar Se Dekha Mujhko.
फिर न कीजे मेरी गुस्ताख निगाहों का गिला,
देखिये आपने फिर प्यार से देखा मुझको। 
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आँखों में तुम्हारी मेरे ही ख्वाब नज़र आते हैं,
जब मैं भी कुछ कहना चाहूँ तो बस तेरे ही अल्फाज़ जुबाँ पर आते हैं

आता है इक सितारा नज़र चाँद के क़रीब,
जब देखते हैं ख़ुद को तुम्हारी नज़र से हम !!

अब तो सिर्फ हिकारत भरी नज़रें है,या खामोश अलफ़ाज़
जो जता जाते हैं की अब हम ना हैं तुम्हारी दुनिया में,ना कोई चाह हमारी!

तुम्हारी एक निगाह से कत्ल होते हैं लोग फराज़
एक नज़र हम को भी देख लो
तुम बिन ज़िन्दगी अच्छी नहीं लगती

तेरी निगाह थी साक़ी कि मैकदा था कोई
मैं किस फ़िराक में शर्मिंदा-ए-शराब हुआ

तेरी निगाह ने क्या कह दिया खुदा जाने,
उलट कर रख दिये बादाकाशों ने पैमाने।

तुम्हारी शरारती नजरों को नज़र न लगे
ख़ुदा करे ये हमेशा यूँ ही मुस्कुराती लगे

तुम्हारी नज़र।हमारा दिल ले बैठी।
बताते आपको हमारे दिल का हाल
अगर तुम्हारी अमीरी बीच में नही आई होती

तुम्हारी सीधी नज़र ने,तो कोई बात न की!
तुम्हारी तिरछी नज़र का,सवाल अच्छा था!

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते..

तुम्हारी मस्त नज़र, अगर इधर नहीं होती
नशे में चूर फ़िज़ा इस क़दर नहीं होती

तुम्हारी शातिर नज़रें क़त्ल करने में माहिर हैं,
हम भी मर-मर कर जीने में उस्ताद हो गये हैं

तुम्हारी नज़रें न जान पायीं अच्छाइयां मेरी,
हम जो सच में ख़राब होते ,तो सोचो कितने फसाद होते..!!

मत मुस्कुराओ इतना कि फूलों को खबर लग जाए,
करें वो तुम्हारी ताऱीफ इतनी कि नज़र लग जाए.

नज़र में ख़्वाब नए,रात भर सजाते हुए
तमाम रातें कटी तुमको गुनगुनाते हुए
तुम्हारी बात,ख़याल में गुमसुम सभी
ने देख लिया हमको मुस्कराते हुए.

नज़र ख़ामोश , ज़ुबान चुप , सदा-ऐ-दिल महरूम ..
किसी का ज़िक्र न निकला , तुम्हारी बात के बाद !!

नज़र तुम्हारी कभी जो उठे, हमारी तरफ ,
नज़र अन्दाज़ ही कर लेना, हमें जी भर कर..

नज़र मिला कर हमसे नजर चुरा रहे हो तुम,
हम नजर भर के देख भी नहीं पाए थे तुम्हारी किसी अदा पे

नज़र से गुफ्तगू,ख़ामोश लब ,तुम्हारी तरह //
ग़ज़ल ने सीखे है अंदाज़,सब तुम्हारी तरह ~बशीरबद्र

नज़रें ना चुराओ यूँ हमसे, सुबह होने में वक़्त काफी है ।
तुम्हारी आँखों को पढ़ लेने दो, उनमें राज़ अभी भी बाकी हैं

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही…?
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही__~फ़ैज़_अहमद_फ़ैज़

न पूछ मंज़र-ए-शाम-ओ-सहर पे क्या गुज़री
निगाह जब भी हक़ीक़त से आश्ना गुज़री

ना-खुदा को छोडकर जिनकी खुदा पर है निगाह,
देखना महफूज किश्ती उनकी तूफानों में है।

जीना भी आ गया मुझे, मरना भी आ गया….
पहचानने लगा हूँ तुम्हारी नज़र को मैं….!!

तुम एक नज़र देख लो खुद को मेरी नज़र से
तुम्हारी नज़रें तलाशेंगी खुद फिर मेरी नज़र को

मतलब निकल जाने पर पलट के देखा भी नही तुमने..!
रिश्ता तुम्हारी नज़र में कल का अखबार हो गया..!!

बहुत खूबसूरत है तुम्हारी मुस्कराहट.. पर तुम मुस्कुराती कम हो,
सोचता हूँ देखता ही रहू तुम्हे पर तुम नज़र आते ही कम हो!!

चलो फिर से समेटें
तुम्हारी मुस्कराहट इस नज़र में
और खुशबु पत्तियों की एक पुडिया में

क़त्ल करती है तुम्हारी एक नज़र हज़ारों का..
ऐसे ना देखा करो हमे.. तुम्हारा एक दीवाना और ख़त्म हो जाएगा

तस्वीरें आज भी बड़ी शिद्दत से देखती हूं तुम्हारी..
पर आंखों मे तेरी वो चाहत नज़र नही आती अब.

जहाँ भरोसा और सच्चाई नज़र आये….वहाँ दोस्ती का हाथ बढ़ाओ वरना
“तुम्हारी तन्हाई”.. तुम्हारी…बेहतरीन साथी है

पहचानने लगा हूँ तुम्हारी नज़र को मैं….
हमदर्दी न करो मुझसे मेरे हमदर्द….
वो भी बड़े हमदर्द थे,जो दर्द हज़ारों दे गये…..!!

जाने क्या कशिश है तुम्हारी मदहोश आँखों में…
नज़र अंदाज़ जितना करो नज़र तुम्हीं पे ही पड़ती है…

आ गया है फर्क तुम्हारी नज़रों में यकीनन…
अब एक खास अंदाज़ से नज़र अंदाज़ करते हो !!

दिल-बर हो एक तुम कि हमारी नज़र में हो
दिल है हमारा दिल कि तुम्हारी नज़र में है

ये शर्म हैं या हया हैं, क्या हैं, नज़र उठाते ही झुक गयी हैं,
तुम्हारी पलकों से गिरके शबनम, हमारी आँखों में रुक गयी है ….!!

जान-ऐ-जा अब हम तुम्हारी नज़र में खटकते ज़रूर है
ये बात अलग है तुम्हारी मोहब्बत भटकते ज़रूर है

यकीनन याद आती रहेगी, तुम्हारी “वो” रूहानी नज़र,
रात भर, और तुम्हारी महकती खुश्बू रहेगी – मेरी “हमसफ़र” रात भर…

मै तुम्हारी हर नज़र का गरूर हो भी सकता था
मै तेरी सब खताओं का कसूर हो भी सकता था

इस कदर प्यार है तुमसे है हमसफर
अब तो जीतें हैं हम बस तुम्हे चाहकर
तुम्हारी हर अदा तुम्हारी हर नज़र
ये क्या कहने लगी तुम्हे है क्या ख़बर

तुम्हीं बताओ कि किस किस से मैं कलाम करूँ हो
तुम भी गोया तुम्हारी नज़र भी गोया है ~अरशद सिद्दीक़ी

तुम एक नज़र देख लो खुद को मेरी नज़र से
तुम्हारी नज़रें तलाशेंगी खुद फिर मेरी नज़र को

कोई एक पल हो तो नज़रें चुरा लें हम,
ये तुम्हारी याद तो साँसों की तरह आती है !!

जाने किस किस पे पड़ी होंगी तुम्हारी नज़रें ,
मैंने चुन चुन के तेरे शहर के पत्थर चूमे.

शरमा के,मारे झुक रही हैं, तुम्हारी नज़रें…
कहा था, इतने क़रीब, ना आया करो…

चलो तुम्हारी ज़िद पे पिये लेते हैं हम साक़ी
पर ये वादा रहे नज़रें कभी ना चुराना हमसे

ज़ख़्मी हो जाता है ये हर बार तुमसे मिल कर,
चाबुक सी नज़रें पड़ती है तुम्हारी इस दिल पर !

कितनी शिकायत भरी नज़रें हैं तुम्हारी मेरी बे-परवाही को चीरती हुई आ गई
मेरी ख़ामोशी की क़द्र तुम कर न पाए मेरा डर अब एक रूमानी वाक़िया हो गया

मैं क्या बताऊँ ये दिलरूबा तेरे सामने मेरा हाल है,
तेरी एक निगाह की बात है मेरी ज़िन्दगी का सवाल है I

छलके शराब बर्क़ गिरे या जलें चराग़
ज़िक्र-ए-निगाह-ए-यार का मौसम न आएगा

मेरी निगाह-ए-शौक़ भी कुछ कम नहीं मगर,
फिर भी तेरा शबाब तेरा ही शबाब है

हमसे अब किसी पर्दे-दारी की उम्मीद न कीजे…
कुछ जुस्तजूएं निगाह तक झुकने नहीं देतीं।

जो निगाह की थी ज़ालिम तो फिर आँख क्यों चुराई,
वो ही तीर क्यों न मारा जो जिगर के पार होता !! -‘अमीर’ मिनाई

हजार रातो मे वो एक रात होती है
निगाह उठाकर तुम देखो जो मेरी तरफ
वो एक निगाह मेरी कायनात होती है

लाखों लगाव, एक चुराना निगाह का,
लाखों बनाव, एक बिगड़ना इताब में। ~मिर्जा_गालिब

मिलते हैं इस अदा से कि गोया ख़फ़ा नहीं
क्या आप की निगाह से हम आश्ना नहीं

सौ सौ उममीदें बधंती हैं एक एक निगाह पर ,
इतने प्यार से ना हमे देखा करे कोई 

यूँ तो शिकायतें मुझे सैंकड़ों हैं तुमसे मगर ,
तुम्हारी एक नज़र ही काफी है सुलह के लिये

ये रात है, ये तुम्हारी जुल्फें खुली हुई है
है चांदनी या तुम्हारी नज़रें से मेरी रातें धुली हुई है

ये कहो, वो कौन सी बात ज़ुबाँ तक आते-आते रूक गयी !
ये बताओ, उस बात की चुप्पी से तुम्हारी नज़रें क्यूँ झुक गयी !!

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